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आचार्य विनोबा भावे का सामाजिक चिन्तन: एक दार्शनिक अध्ययन
डॉ. शोभा आर. मिश्र, लोकेश टोपे
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सारांश: सर्वाेदय की सामाजिक व्यवस्था की भी आलोचना की गई है। मुख्य आलोचना समाज में जाति-व्यवस्था को स्वीकार करने के कारण उत्पन्न होती है। तथापि, इस व्यवस्था में जाति को व्यवसाय के आधार पर स्वीकार किया गया है। गांधी के अनुसार, यह व्यक्ति के वंशानुगत पारिवारिक कर्तव्य से उत्पन्न एक वैध आजीविका का प्रतिनिधित्व करती है। जातियों के बीच कोई ऊँच-नीच या भेदभाव नहीं किया जाता; इसके विपरीत, समानता की भावना को बढ़ावा दिया जाता है। इसलिए विनोबा जी ने शिक्षित और अशिक्षित, सामान्य नागरिक, शासक, व्यापारी तथा बुद्धिजीवीकृसभी के लिए स्वैच्छिक श्रम सेवा को आवश्यक घोषित किया। इससे राष्ट्र की श्रमशक्ति का उपयोग जनकल्याण के लिए सुनिश्चित होता है और साथ ही अनेक अन्य महत्वपूर्ण लाभ भी प्राप्त होते हैं। संत विनोबा का विश्वास था कि समाज में श्रम और विचारकृदोनों को समान सम्मान मिलना चाहिए। इससे मालिक और मज़दूर का भेद समाप्त हो जाएगा। इससे मातृत्व और स्नेह की भावनाएँ विकसित होंगी तथा ऊँच-नीच का भेद मिट जाएगा। इसी आधार पर सामाजिक समरसता की भावना स्थापित होनी चाहिए। अमीर और गरीब, छोटे और बड़े, शिक्षित और अशिक्षित, सरकारी और गैर-सरकारी कर्मचारी, तथा पुरुष और महिलाकृइन सबके बीच के भेद समाप्त हो जाएँगे। साथ ही राष्ट्रकार्य के लिए प्रचुर श्रमशक्ति भी उपलब्ध होगी। इसका मूल सिद्धांत यह है कि धन समाज के सहयोग से अर्जित होता है; इसलिए उसका उपयोग भी समाज-सेवा के लिए होना चाहिए। अपने एक प्रस्ताव में सर्व सेवा संघ ने कहा कि संपत्ति दान के पीछे का सिद्धांत यह है कि उत्पादन के साधन समाज और ग्राम समुदाय के हाथों में बने रहने चाहिए। सामाजिक जीवन को सरल, सामंजस्यपूर्ण और सुखी बनाने के लिए विनोबा जी ने कहा कि प्रत्येक सक्षम व्यक्ति, चाहे वह सामान्य नागरिक हो, शासक वर्ग का सदस्य हो, बुज़ुर्ग हो, व्यापारी हो, शिक्षक हो या सैनिककृउसे प्रतिदिन उत्पादक श्रम करना चाहिए। इसी संदर्भ में उन्होंने श्रमदान आंदोलन प्रारंभ किया और लोगों से अपील की कि वे अपने श्रम का एक भाग लोक-सेवा के लिए समर्पित करें। इसके बिना न तो भूदान यज्ञ (सर्वाेदय आंदोलन) सफल होगा, न ही गरीबों का उत्थान, अमीर-गरीब की असमानता का अंत, या सर्वाेदय समाज की स्थापना संभव होगी। उन्होंने आगे कहा कि भारत का प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन कम-से-कम एक घंटे का स्वैच्छिक श्रम अवश्य करे। आज देश को उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है। अनेक नेता कहते हैं, उत्पादन बढ़ाओ, उत्पादन बढ़ाओ, पर क्या उत्पादन बढ़ाना केवल कृषि मज़दूरों से आठ घंटे के स्थान पर नौ घंटे काम करवाने का विषय है? वर्तमान में लाखों एकड़ भूमि बंजर पड़ी है। उसे खोदकर खेती योग्य बनाया जाना चाहिए। हज़ारों गाँवों में सड़कें बनाई जानी चाहिए। यात्रियों के लिए गाँवों में चौपालें तैयार की जानी चाहिए। कचरे से उचित ढंग से खाद बनाई जानी चाहिए। ढके हुए और स्वच्छ शौचालय बनाए जाने चाहिए। पत्तियाँ व्यर्थ जा रही हैं। उनके उपयोग के लिए विभिन्न स्थानों पर सैकड़ों खाद के गड्ढे खोदे जाने चाहिए। गाँवों में विद्यालयों के लिए सैकड़ों छोटी झोपड़ियाँ बनाई जानी चाहिए। छोटी नदियों का पानी व्यर्थ बह रहा है, उसे संरक्षित करने के लिए छोटे बाँध बनाए जाने चाहिए। विभिन्न स्थानों पर सिंचाई की नहरें खोदी जानी चाहिए। हज़ारों खेतों में भूमि समेकन की आवश्यकता है। विभिन्न स्थानों पर उपयोगी वृक्ष लगाए जाने चाहिए। अलग-अलग क्षेत्रों में स्वच्छता अभियान चलाए जाने चाहिए। दलदली क्षेत्रों में छोटी जल-निकासी नालियाँ बनाई जानी चाहिए। क्या सरकार अकेले यह सब कर सकती है?
मुख्य शब्द: संपत्ति दान, समाज, ग्राम समुदाय, शासक, उत्थान, असमानता आदि।
How to Cite:
[1] डॉ. शोभा आर. मिश्र, लोकेश टोपे, “आचार्य विनोबा भावे का सामाजिक चिन्तन: एक दार्शनिक अध्ययन,” International Advanced Research Journal in Science, Engineering and Technology (IARJSET), DOI: 10.17148/IARJSET.2026.13742
